Saturday, 1 August 2026

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इस बार शनि जयंती पर 50 साल बाद बन रहा केदार राजयोग

16 मई 2026 को बनेगा दुर्लभ संयोग

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इस बार बेहद खास्य रहेगा शनि जयंती का दिन

16 मई 2026 का दिन हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में बेहद खास माना जा रहा है। इस बार शनि जयंती सिर्फ शनिदेव के प्राकट्य दिवस के रूप में ही नहीं, बल्कि कई दुर्लभ और शुभ संयोगों की वजह से भी चर्चा में है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन शनिश्चरी अमावस्या, केदार राजयोग, बुधादित्य राजयोग, सर्वार्थ सिद्धि योग, सौभाग्य योग और शोभन योग जैसे शक्तिशाली योग एक साथ बन रहे हैं, जिससे यह दिन और भी फलदायी माना जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव को भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त हुआ था कि वे नवग्रहों में न्यायाधीश के रूप में पूजे जाएंगे। इसी कारण शनि देव को कर्मफलदाता कहा जाता है। मान्यता है कि वे व्यक्ति को उसके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल देते हैं। यही वजह है कि शनि जयंती के दिन लोग विशेष रूप से पूजा-पाठ, व्रत और दान करते हैं ताकि जीवन के कष्ट कम हों और शनि देव की कृपा प्राप्त हो सके।

2026 की शनि जयंती क्यों है खास?

इस बार शनि जयंती 16 मई को पड़ रही है और खास बात यह है कि इसी दिन शनिवार और अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम समय माना गया है।

इतना ही नहीं, लगभग 50 वर्षों बाद केदार राजयोग भी बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह योग तब बनता है जब कुंडली के सात घरों में सभी ग्रह उपस्थित हों। इसे धन, सफलता और करियर में बड़ी उपलब्धियों का संकेत माना जाता है।

बन रहे हैं कई शुभ योग

पंचांग के अनुसार इस दिन सौभाग्य योग और शोभन योग भी बन रहे हैं। सौभाग्य योग 15 मई दोपहर 2:21 बजे से शुरू होकर 16 मई सुबह 10:26 बजे तक रहेगा। इसके बाद शोभन योग प्रारंभ होगा, जो 17 मई सुबह 6:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। इन दोनों योगों को पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

 वहीं शनि जयंती के दिन भरणी नक्षत्र शाम 5:30 बजे तक रहेगा, जिसके बाद कृत्तिका नक्षत्र शुरू होगा। भरणी नक्षत्र के देवता यमराज और कृत्तिका नक्षत्र के देवता अग्नि माने जाते हैं। ज्योतिषियों का मानना है कि इन नक्षत्रों का प्रभाव इस दिन की आध्यात्मिक ऊर्जा को और अधिक बढ़ा सकता है।

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पौराणिक मान्यता और कथाएं

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनि देव सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं। कहा जाता है कि माता छाया के अपमान से क्रोधित होकर शनि देव ने कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें न्याय का देवता और कर्मफलदाता बनने का वरदान दिया। तभी से शनि देव को अनुशासन, न्याय और कर्मों के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।

क्या करें शनि जयंती पर?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। इसके अलावा काले तिल, उड़द दाल, काले वस्त्र और सरसों के तेल का दान करने से साढ़ेसाती और ढैय्या के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं। शनिदेव के साथ हनुमान जी की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि हनुमान भक्ति से शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।

स्वयं के बदलाव का अवसर

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि जयंती सिर्फ पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि आत्म-विश्लेषण और अपने कर्मों को सुधारने का अवसर भी है। माना जाता है कि सच्चे मन से किए गए अच्छे कर्म, सेवा और दान से जीवन में स्थिरता, सफलता और सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं।
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