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78 साल बाद बदला लाहौर का चेहरा
पाकिस्तान बदल रहा नाम?
पाकिस्तान में एक ऐसा बदलाव शुरू हुआ है, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पहली बार लाहौर की सड़कों और मोहल्लों से जुड़ी पहचान बदली जा रही है। दशकों पहले जिन हिंदू, सिख और जैन नामों को हटाकर इस्लामी नाम दिए गए थे, अब उन्हें फिर से वापस लाने की कोशिश हो रही है।
लाहौर की गलियों में लगे नए साइनबोर्ड अब लोगों को चौंका रहे हैं। जहां कभी ‘इस्लामपुरा’ लिखा दिखता था, वहां अब ‘कृष्णा नगर’ नजर आ रहा है। ‘रहमान गली’ को फिर ‘राम गली’ कहा जाने लगा है, जबकि ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम बदलकर ‘जैन मंदिर चौक’ कर दिया गया है।
पाकिस्तान में यह सिर्फ नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि इसे इतिहास, राजनीति और वैश्विक छवि से जोड़कर देखा जा रहा है।
आखिर क्यों बदले जा रहे हैं पुराने नाम?
लाहौर में चल रहा यह अभियान पंजाब सरकार के बड़े प्रोजेक्ट ‘लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल’ (LHAR) का हिस्सा है। इस परियोजना का उद्देश्य लाहौर को उसकी विभाजन-पूर्व सांस्कृतिक पहचान के साथ दोबारा जीवित करना है।
करीब 50 अरब पाकिस्तानी रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री Nawaz Sharif का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है। अब उनकी बेटी और पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री Maryam Nawaz इसे आगे बढ़ा रही हैं।
पिछले दो महीनों में पाकिस्तान में करीब 9 जगहों के नाम बदले जा चुके हैं और कई अन्य स्थानों को भी उनके पुराने नाम लौटाने की तैयारी चल रही है।
सिर्फ इतिहास नहीं, रणनीति भी?
पंजाब सरकार का कहना है कि जैसे यूरोप अपने ऐतिहासिक शहरों और विरासत को सहेजकर रखता है, वैसे ही पाकिस्तान को भी अपनी सांस्कृतिक पहचान मिटाने के बजाय उसे संरक्षित करना चाहिए।
सरकार का मानना है
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की उस छवि को बदलने की कोशिश भी है, जो वर्षों से कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न से जुड़ी रही है।
विभाजन के बाद बदली थी पहचान
1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख समुदाय पलायन कर गए थे। इसके बाद कई मंदिर, गुरुद्वारे और पुराने मोहल्लों के नाम बदले गए। धीरे-धीरे शहरों की पहचान भी बदलती चली गई।
लेकिन अब, लगभग 78 साल बाद, पाकिस्तान उन्हीं ऐतिहासिक नामों को फिर से सामने ला रहा है। यही वजह है कि यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।