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गोविंदा और चंकी पांडे को दिया था पहला बड़ा ब्रेक
90 के दशक में पहलाज निहलानी ने दी थी कई सुपर हिट फिल्में
हिंदी सिनेमा के एक ऐसे निर्माता, जिन्होंने कई सितारों की किस्मत चमकाई और अपने फैसलों से अक्सर सुर्खियां बटोरीं, अब इस दुनिया में नहीं रहे। फिल्म निर्माता और पूर्व CBFC चेयरमैन पहलाज निहलानी का 76 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे निहलानी ने बुधवार देर रात करीब 3 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई।
मुंबई के सांताक्रूज श्मशान घाट में गुरुवार दोपहर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां फिल्म जगत से जुड़े कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
बदली कई सितारों की किस्मत
पहलाज निहलानी का नाम सिर्फ फिल्मों के निर्माण तक सीमित नहीं था। उन्हें उन लोगों में गिना जाता है जिन्होंने बॉलीवुड को कई नए चेहरे दिए। 1982 में फिल्म हथकड़ी से उन्होंने निर्माता के रूप में अपना सफर शुरू किया। इसके बाद आंधी-तूफान ने उन्हें इंडस्ट्री में मजबूत पहचान दिलाई।
1986 में फिल्म इल्जाम बनाई
लेकिन असली चर्चा तब शुरू हुई जब उन्होंने 1986 में फिल्म इल्जाम बनाई। यही वह फिल्म थी जिसने गोविंदा को बॉलीवुड में पहला बड़ा मंच दिया। फिल्म हिट रही और गोविंदा देखते ही देखते दर्शकों के चहेते सितारे बन गए। इसके एक साल बाद आग ही आग के जरिए चंकी पांडे ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा। इस तरह निहलानी सिर्फ निर्माता नहीं, बल्कि कई कलाकारों के करियर के अहम सूत्रधार भी बने।
'आंखें', 'शोला और शबनम' जैसी फिल्मों से रचा इतिहास
90 का दशक पहलाज निहलानी के करियर का सुनहरा दौर माना जाता है। उन्होंने शोला और शबनम और आंखें जैसी फिल्मों का निर्माण किया, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की। खासकर आंखें उस दौर की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में गिनी गई। फिल्म ने न सिर्फ रिकॉर्ड कमाई की, बल्कि दर्शकों के दिलों में भी खास जगह बनाई।
CBFC चीफ रहते हुए भी खूब रहे चर्चा में
फिल्म निर्माता के अलावा पहलाज निहलानी का नाम सेंसर बोर्ड से भी जुड़ा रहा। वर्ष 2015 से 2017 तक उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान कई फिल्मों में कट लगाने और बोल्ड या हिंसक दृश्यों पर सख्त रुख अपनाने को लेकर वे लगातार चर्चा में रहे। कई फिल्मकारों ने उनके फैसलों की आलोचना भी की, जबकि समर्थकों का कहना था कि वे भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को ध्यान में रखकर निर्णय लेते थे।