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11वीं सदी के मंदिर के मिले सबूत
धार से लंदन तक मां वाग्देवी की घर वापसी की कहानी
भोजशाला पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: मां वाग्देवी मूर्ति की वापसी का खुला रास्ता
11वीं सदी के मंदिर के मिले सबूत
राजा भोज की विरासत पर अदालत की मुहर
धार से लंदन तक मां वाग्देवी की घर वापसी की कहानी
धार की ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर देशभर में चर्चा का केंद्र बन गई है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने सदियों पुराने विवाद को नई दिशा देते हुए लंदन के British Museum में रखी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने की उम्मीद जगा दी है। इतिहास के मुताबिक परमार वंश के राजा राजा भोज ने 1034 ईस्वी में धार में 'सरस्वती सदन' नामक विशाल शिक्षा केंद्र की स्थापना की थी। यह संस्कृत, दर्शन और वेद अध्ययन का प्रमुख केंद्र माना जाता था, जिसे उस दौर में 'विद्या की काशी' कहा जाता था। यहीं मां सरस्वती यानी वाग्देवी की भव्य प्रतिमा स्थापित थी।
अलाउद्दीन खिलजी का हमला
लेकिन 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के हमले के बाद भोजशाला को भारी नुकसान पहुंचा। बाद के शासकों ने मंदिर के अवशेषों से यहां मस्जिद का ढांचा तैयार कराया, जिसे बाद में कमाल मौला मस्जिद कहा गया। इसी दौर में मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा गायब हो गई।
लंदन कैसे पहुंची वाग्देवी
साल 1875 में अंग्रेजों के समय हुई खुदाई में यह प्रतिमा दोबारा मिली, लेकिन 1880 में ब्रिटिश अधिकारी मेजर किनकेड इसे लंदन ले गए। बाद में पुरातत्वविद विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1961 में पुष्टि की कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मूर्ति ही धार की असली वाग्देवी प्रतिमा है।
वैज्ञानिक सर्वे में मिले मंदिर के पुरातात्विक प्रमाण
आजादी के बाद भोजशाला को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर इसकी देखरेख की जिम्मेदारी Archaeological Survey of India (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को सौंप दी गई। 2024 में एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे में मंदिर से जुड़े कई पुरातात्विक प्रमाण, देवी-देवताओं की मूर्तियां और यज्ञकुंड मिले। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि मौजूदा ढांचा परमारकालीन मंदिर के अवशेषों पर खड़ा है। इन्हीं सबूतों के आधार पर हाई कोर्ट ने माना कि भोजशाला का मूल स्वरूप वाग्देवी मंदिर था।
लौटेगी मां वाग्देवी की मूर्ति?
कोर्ट ने केंद्र सरकार को मां वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन से वापस लाने के प्रयास तेज करने के निर्देश भी दिए हैं।
अब निगाहें केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय पर टिकी हैं। भारत सरकार यूनेस्को कन्वेंशन के तहत ब्रिटेन से प्रतिमा लौटाने की मांग उठा सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक मूर्ति की वापसी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत की बड़ी घर वापसी मानी जाएगी।